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    भारत का वो गीत, जिसे सुनकर अंग्रेजों के खड़े हो जाते थे कान, किसी के गाने और छापने पर भी लगा था बैन

    इस गीत के गाने और प्रिटिंग प्रेस से छापने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया था। राजद्रोह का मामला दर्ज कर उसके ऊपर कार्रवाई की जाती थी। उस समय अंग्रेजों के बीच में इस गीत को लेकर भय का माहौल था।

    आज भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को 150 साल हो गए हैं। 1875 के उस ऐतिहासिक दिन से लेकर आज तक, यह गीत न सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम का नारा बना, बल्कि अंग्रेजों के कानों में जहर की तरह घुल गया था। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत, जो मातृभूमि की आराधना का प्रतीक है। इसे सुनते ही ब्रिटिश अफसरों के कान खड़े हो जाते थे। अंग्रेजों द्वारा वंदे मातरम् गीत को गाने या छापने पर भी बैन लगा दिया गया था। तब यह गीत लाखों भारतीयों के खून में उबाल भरता रहा।

    बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की इस गीत की रचना
    7 नवंबर 1875 को बंगाल के नैयहाटी गांव के रहने वाले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने संस्कृत और बंगाली के मिश्रण में ‘वंदे मातरम्’ की रचना की थी। यह छह छंदों वाला भजन मूल रूप से उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा था, जो 1882 में प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास में सन्यासी विद्रोह की कहानी के माध्यम से बंकिम ने भारत को मां दुर्गा के रूप में चित्रित किया था। इसमें सुफलाम्, सुफलाम्, मलयजशीतलाम्…। यह गीत गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत को समृद्धि और शक्ति का सपना दिखाता था।

    रवींद्रनाथ टैगोर ने कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में गाया
    रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में इसे संगीतमय रूप दिया और कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में गाकर, इसे अमर कर दिया। तब ब्रिटिश राज ने इसे अपनी सरकार के खिलाफ खतरनाक मान लिया। 1905 के बंगाल विभाजन के दौरान स्वदेशी आंदोलन में यह नारा बन गया।

    सार्वजनिक रूप से गाने या छापने पर प्रतिबंध
    प्रदर्शनकारियों के मुंह से ‘वंदे मातरम्’ की गूंज सुनकर अंग्रेज सिपाहियों के कान खड़े हो जाते। लॉर्ड कर्जन की सरकार ने इसे सार्वजनिक रूप से गाने या छापने पर प्रतिबंध लगा दिया। जेल और जुर्माने की धमकी के बावजूद, क्रांतिकारी इसे गाते रहे। बरिसाल में हजारों ने बैन तोड़कर सामूहिक गायन किया, जबकि भिकाजी कामा ने 1907 में जर्मनी में तिरंगे पर ‘वंदे मातरम्’ लिखकर विद्रोह का संदेश फैलाया।

    अंग्रेजों ने इसे राजद्रोह तक करार दिया
    इस बात से नाराज ब्रिटिश साम्राज्य ने ‘आनंदमठ’ किताब और गीत दोनों पर बैन लगाया, इसे ‘राजद्रोह’ करार दिया। 1905-07 के आंदोलनों में यह क्रांतिकारियों का हथियार बना। अरविंद घोष ने इसे ‘स्वतंत्रता का मंत्र’ कहा, तो सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज में इसे अपनाया।

    24 जनवरी 1950 को ये राष्ट्रीय गीत बना
    1937 में कांग्रेस ने मुस्लिम संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए पूर्ण गीत के बजाय पहले दो छंदों को ही आधिकारिक रूप दिया, जिस पर आज भी बहस होती है। फिर भी 15 अगस्त 1947 को शरतचंद्र चटर्जी ने संविधान सभा में इसे गाकर आजादी का स्वागत किया। 24 जनवरी 1950 को यह राष्ट्रीय गीत घोषित हुआ। तब से ‘वंदे मातरम्’ आज भी भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है।

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